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Showing posts from April, 2020

अँधियारे में पड़े सवाल

सत्ता हैं नशे में चूर, परिपथ पर पसरी धूल, कर्मवीर ने थामी  डोर, सत्ता के गलियारों में शोर, जन में ही खाँचे में बांटा, तीव्रता से मन को चाटा, प्राणों का कोई मोल नही, मृत्यु का कोई शोर नहीं, कंकड़ के जज़्बात नहीं, पत्थर जैसे कोई बात नहीं, हीरों में चमक सत्ता के अनुकूल, आज कंकड़ पथ पर पसरी धूल, महल सुसज्जित सूर्य किरणों में, रवि फिर नहीं पहुँचा जुग्गियों में। -©Akash Sisodia

मजदूर,वायरस और समाज -आकाश सिसोदिया

घर की रसोई से छन-छन की आवाज़ आ रही हैं, पकवानों की लंबी लिस्ट आज तैयार हो रही हैं, देश बंद, शहर बंद, मोहल्ला भी बंद हैं, आज घर में बैठना ,खाना, फ़िल्म भी देखना हैं, पर घर में रहना भी आज हमें भारी सा लग रहा हैं, वहीं एक परिवार अपने भूखें पेट लेकर चल रहा हैं, आज वो न चाहते हुए भी मिलों पैदल सफर कर रहा हैं, पैरों की चपलें भी सड़क के गड्ढो से टूट चुकी हैं, पानी की बूंद की तालाश में उन्हें नर्क से गुजरना पड़ रहा हैं, भूखे बच्चों की पेट के लिए उसे अपना पेट खाली रखना पड़ रहा हैं, खाली रोटी भी निगलने के लिए पानी भी उनके पास नहीं, ग़रीबी उनका दुश्मन था हीं, पर आज उन्हें और डुबाने ये वायरस भी आगया हैं, सवाल ये हैं वो वायरस से बचाते हुए क्या वो भुखमरी से मर जाएँगे?? उनके पाओं के घाव भी दर्शाते हैं उनके हालात इस समय क्या हैं, उनके मलिकों द्वारा बिना वेतन के निकाल दिया जाना, जिस शहर को बनाने मे उन्होंने जीवन दिया वहाँ उनके साथ का बुरा व्यवहार, कुछ जो काम करते थे उनके घर पे जो इस वायरस से ग्रषित हैं उन्हें फ़िर भी अपने संपर्क में काम करवाना, क्या यह गलत नहीं? उनके हालात वक़्त के साथ और खराब होते जा रहे हैं,...

उल्टी दुनिया - आकाश सिसोदिया

21वी सदी और दुनिया का  बहाव बहुत अधिक तेज़ी से मुड़ गया हैं,इस इंसानी दुनिया के चश्मे पर जमीं धूल उसे अंधा बनाती गयी और वो  दिखने का नाटक करता गया पर उसे कुछ दिख नही रहा हैं।इतिहास जो खुद मनुष्यों ने लिखा हैं, वहाँ खुद उसे उपार्जन करने वाले को कोई महत्व ही नही दिया गया हैं।इंसानी जीवन आज पूरी तरह से व्यपार बन चुका हैं,जहाँ मनुष्य की कीमत नही उस से होने लाभ की कीमत हैं।पूरी दुनिया ,पूरा देश अपने ही दिखाए निर्देश को प्रथम मानकर पूरा दुनिया को छोटा। यह तो वही हो गया चींटी जो अपने मांद में रहकर अपने को सर्वश्रेष्ठ कह रही हैं परंतु वो खुद उसे भी ज्यादा शक्तिशाली के पास है क्या यह हैं एक भूल नहीं हैं? कोई धर्म जो अपने आपको परमात्मा का वंशज  मानता हैं और चाहता हैं की सब उसके परमात्मा को बिना कुछ पूछे उसे मानें,पर यह भी तो गलत हैं यदि  धर्म किसी को जबरदस्ती अपनाना पड़े, तो क्या वो धर्म इंसानियत को दबाती नही हैं? अमीर-गरीब,जाति,धर्म,व्यपार यह सब इंसानियत को दबा नही रहें, यह भी एक मुख्य सवाल है? खैर अपने ध्यान दिया होगा सारे प्रश्न इंसान से संबंधित है , इस का अर्थ यह तो नही की सि...

आँखों वाली मौत - आकाश सिसोदिया

मृत्यु देखा,मृत्यु का आतंक देखा, भय में ग्रसित जन को रोते देखा, भूख की पीड़ा को मन में खलते देखा, नयन को मौत की तलाश करते देखा आँखों में अपाहिचपन का दर्द देखा, बदन पर हाथ हैं , पर उसको भी अपंग देखा, लंबा कोस सफर तय करते देखा, आज पुनः एक बालक को मरते देखा, मानवता की खाई को समाज में बढ़ते देखा, आज की त्रासदी  में उसी खाई में उन बालकों को निगलते देखा, आज मैंने अपने ही आँखों को अपँग देखा। -आकाश सिसोदिया

मन का युद्ध

                                मन का युद्ध निःशब्दता को चीरता हुआ मेरा व्याकुल मन, रणभूमि,क्रोध, प्रेम पर डगमगाता मेरा लक्ष्य, गगन-पथ पर चलता मेरा स्वाभिमान, थल की सीमाओं से टकराता मेरा व्यक्तित्व, गृह-युद्ध से झुझता मेरा अंतरमन, दर्पण में दिखता मेरा अतीत, जल के प्रतिबिम्ब में दर्शता मेरा भविष्य, मैं मन जो सब में हुँ , किसी में जीवित ,किसी में मुर्छित, मैं दर्पण हुँ , मैं विषलेशक हुँ, मैं कर्मा हुँ।  - आकाश सिसोदिया