मन का युद्ध
निःशब्दता को चीरता हुआ मेरा व्याकुल मन,
रणभूमि,क्रोध, प्रेम पर डगमगाता मेरा लक्ष्य,
गगन-पथ पर चलता मेरा स्वाभिमान,
थल की सीमाओं से टकराता मेरा व्यक्तित्व,
गृह-युद्ध से झुझता मेरा अंतरमन,
दर्पण में दिखता मेरा अतीत,
जल के प्रतिबिम्ब में दर्शता मेरा भविष्य,
मैं मन जो सब में हुँ ,
किसी में जीवित ,किसी में मुर्छित,
मैं दर्पण हुँ , मैं विषलेशक हुँ, मैं कर्मा हुँ।
- आकाश सिसोदिया
निःशब्दता को चीरता हुआ मेरा व्याकुल मन,
रणभूमि,क्रोध, प्रेम पर डगमगाता मेरा लक्ष्य,
गगन-पथ पर चलता मेरा स्वाभिमान,
थल की सीमाओं से टकराता मेरा व्यक्तित्व,
गृह-युद्ध से झुझता मेरा अंतरमन,
दर्पण में दिखता मेरा अतीत,
जल के प्रतिबिम्ब में दर्शता मेरा भविष्य,
मैं मन जो सब में हुँ ,
किसी में जीवित ,किसी में मुर्छित,
मैं दर्पण हुँ , मैं विषलेशक हुँ, मैं कर्मा हुँ।
- आकाश सिसोदिया
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